Chhattisgarh News: बच्चा जन्म के बाद इस पृथ्वी में दुध पीने से पहले ऑक्सीजन लेता है. ऑक्सीजन की अहमियत आप सभी लोगों ने कोरोना काल में देखी होगी. लगातार डेवलपमेंट के नाम पर लाखों पेड़ काट दिए जाते हैं. इसका हर्जाना इस पृथ्वी को चुकाना पड़ सकता है. इंसान तो आते जाते रहते हैं,  लेकिन पृथ्वी ही नहीं रहेगी तो वो कहां रहेंगे. केवल इंसान ही नहीं बाकी सभी जीवित प्राणी भी कहां रहेंगे. इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढने के लिए अयोध्या (Ayodhya) से एक 25 साल का युवा देशभर में पैदल यात्रा कर रहा है.

दरअसल, आशुतोष पांडे (Ashutosh Pandey) 4 दिसंबर 2022 को बिना घर में बताए दुनिया बचाने के संकल्प लिए वंदे भारत पदयात्रा (Vande Bharat Padyatra) पर निकल पड़े. कई राज्यों में पैदल चल कर आशुतोष रायपुर (Raipur) पहुंचे है. उन्होंने  पर्यावरण संरक्षण के लिए 4 महीने में देशभर के 23 राज्यों में 2600 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी कर ली है. उन्होंने देशभर के  राज्यों में 10 हजार किलोमीटर पदयात्रा करने का संकल्प लिया है. उन्होंने 2024 के अंत में पदयात्रा पूरा करने का लक्ष्य बना लिया है. वो रोजाना 30 से 40 किलोमीटर पैदल चलते हैं. 

क्लाइमेट के लिए आशुतोष ने 10 लाख के पैकेज वाली नौकरी छोड़ दी

आशुतोष पांडेय ने एबीपी न्यूज को बताया कि वो प्राइवेट नौकरी करते थे. उनका सालाना पैकेज 10 लाख रुपये था. लेकिन उन्होंने कोरोना काल में देश में ऑक्सीजन की किल्लत देखी है. कोरोना ने पूरी दुनिया को हिला दिया. तब उन्हें समझ में आया कि इस टाइम सबसे जरूरी है प्रकृति को बचाना. उन्होंने कहा कि 1952 में हमारे देश में 52 करोड़ लोग थे. आज देश में 130 करोड़ लोग है. उस टाइम पेड़ ज्यादा और लोग कम थे. लेकिन आज पेड़ कम है. देश में लगातार जनसंख्या बढ़ रही है और इंसान लगातार पेड़ काट रहे हैं. इसलिए स्कूलों में बच्चों को पेड़ लगाने के लिए शिक्षा देनी चाहिए. आशुतोष ने अपनी मुहिम के बारे में बताते हुए कहा कि स्कूली बच्चों को पेड़ लगाने के लिए जागरूक करना चाहिए. इसके लिए वो जिस जिले से गुजरते हैं, वहां के कलेक्टर से मुलाकात करने की कोशिश करते हैं.  साथ ही उसने आग्रह करते हैं की जब बच्चे पहली बार स्कूल आए तो उनसे पेड़ लगवाएं. यही नहीं सत्र के अंत में पेड़ की ग्रोथ और उसकी देखभाल करने के हिसाब से उनको परीक्षा में अंक दें. इससे बच्चों के साथ उनके माता पिता की भी रुचि बढ़गी और धीरे धीरे लोगों का पर्यावरण के प्रति प्रेम बढ़ जाएगा. ये मुहिम रंग लाई तो देश में 20 करोड़ पेड़ हर साल लगेंगे.

आशुतोष पांडेय अपने पदयात्रा के दौरान भागवत गीता लेकर चलते हैं. उन्होंने बताया कि वो रास्ते में होटल, मंदिर और आश्रम में रुकते हैं. वो  कपड़े और कुछ जरूरी सामान अपने साथ रखते हैं. उनके बैग का वजन 21 किलों है. उन्होंने बताया कि वो जहां जाते हैं. वहां उनको कोई न कोई खाना खिला देता है. उनके बैग में खाने के साथ- साथ कुछ किताबे रखी हैं. कभी कभी बैठकर वो किताबे पढ़ते हैं. अब तक चल-चलकर उनके 3 जूते खराब हो चुके हैं. लगातार चलने से उनके पैरों में दर्द भी होता है, लेकिन वो कहते हैं इसमें भी उन्हें सुकून मिलता है.

घर में रोते हैं मां बाप 

आशुतोष का परिवार यूपी के सुल्तानपुर में रहता है. आशुतोष का परिवार आज उनके के लिए रो रहा है. माता पिता उनके पदयात्रा के फैसले के समर्थन में नहीं है. आशुतोष ने बताया कि घर वाले पदयात्रा का मतलब सन्यास समझ रहे हैं. इसके कारण परिवार वाले डर गए हैं.  रिश्तेदारों और समाज के लोगों से आलोचना सुनकर उनकी माता बीमार हो गई हैं. यही नहीं वो रो रही हैं,  लेकिन वो कहते हैं की हर बच्चे को एक बार अपने मां बाप को रुलाना चाहिए. लेकिन वो खुशी के आंसू होने चाहिए. वो कहते हैं कि 130 करोड़ लोग के पास आधार कार्ड है,  लेकिन उनकी पहचान नहीं है. वो कहते हैं कि वो अपने परिवार के लिए पैसे नहीं कमा सकते, लेकिन उनको सम्मान दिला सकते हैं.

पदयात्रा की शुरुआत में पागल कहा गया

आशुतोष जाने से पहले घर वालों जब ये बताया की वो नौकरी छोड़कर देशभर में क्लाइमेट बचाने के लिए पदयात्रा करना चाहते हैं. आशुतोष ने बताया कि इसपर  उनके घर वाले ने उन्हें पागल कह दिया था. बोल रहे थे इसे डॉक्टर को दिखाओ. क्योंकि उन्होंने अपनी 90 हजार की सैलरी वाली नौकरी छोड़ दी. लेकिन वो कहते हैं कि आप पागल नहीं होंगे तो इतिहास कैसे बनाएंगे. नाचने वालों को लोग देखते हैं. लेकिन वो पैदल चलते हैं तो उन्हें गाले देते हैं. उन्होंने कहा कि भारत का आइडोलॉजी को बदलना पड़ेगा.

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